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आलेख:
कभी प्राकृतिक गैस को दुनिया की “साफ़” ऊर्जा का भविष्य बताया जाता था।
कोयले से कम प्रदूषण करने वाला ईंधन।
एक ऐसा सहारा, जो दुनिया को धीरे-धीरे नवीकरणीय ऊर्जा तक ले जाएगा।
लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है।
दुनिया की बिजली व्यवस्था में गैस की पकड़ लगातार कमजोर हो रही है।
और उसकी जगह सबसे तेज़ी से सूरज की रोशनी ले रही है।
वैश्विक ऊर्जा थिंक टैंक Ember की नई रिपोर्ट कहती है कि दुनिया की बिजली व्यवस्था में गैस की हिस्सेदारी लगातार पाँचवें साल घटी है। रिपोर्ट के मुताबिक 2020 में वैश्विक बिजली मिश्रण में गैस की हिस्सेदारी 23.9 प्रतिशत थी, जो 2025 में घटकर 21.8 प्रतिशत रह गई।
यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब दुनिया की बिजली मांग लगातार बढ़ रही है।
लेकिन नई मांग को पूरा करने में अब गैस की भूमिका पहले जैसी नहीं रही।
रिपोर्ट बताती है कि 2025 में सौर ऊर्जा उत्पादन में 636 टेरावॉट घंटे की बढ़ोतरी हुई, जबकि गैस आधारित बिजली उत्पादन सिर्फ 38 टेरावॉट घंटे बढ़ा। यानी सौर ऊर्जा की रफ्तार गैस से 17 गुना ज्यादा रही।
इतना ही नहीं, 2025 में दुनिया में पैदा हुई नई बिजली मांग का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा अकेले सौर ऊर्जा ने पूरा किया। गैस का योगदान सिर्फ करीब 5 प्रतिशत रहा।
यानी दुनिया की नई बिजली अब धीरे-धीरे जीवाश्म ईंधनों से नहीं, बल्कि साफ़ ऊर्जा से आ रही है।
Ember की वरिष्ठ बिजली विश्लेषक मालगोर्ज़ाता वियात्रोस मोतिका कहती हैं कि अब अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा, दोनों ही नवीकरणीय ऊर्जा के पक्ष में जाती दिख रही हैं। उनके मुताबिक सौर और पवन ऊर्जा लागत घटा रही हैं और देशों को ईंधन की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के झटकों से भी बचा रही हैं।
रिपोर्ट कहती है कि हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक संकटों ने भी गैस पर निर्भरता को लेकर देशों की सोच बदल दी है।
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में गैस की कीमतों में भारी उछाल आया। इसके बाद कई देशों ने नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाया। हाल में पश्चिम एशिया संघर्ष से जुड़े एलएनजी झटकों ने भी देशों को आयातित गैस के जोखिम का एहसास कराया।
मालगोर्ज़ाता वियात्रोस मोतिका कहती हैं कि हाल के संकटों ने यह साफ़ कर दिया कि आयातित गैस पर निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। उनके मुताबिक अब देश ऐसी ऊर्जा की तरफ बढ़ रहे हैं जो घरेलू स्तर पर उपलब्ध हो, कीमत में स्थिर हो और जल्दी स्थापित की जा सके।
रिपोर्ट का एक बड़ा निष्कर्ष यह भी है कि दुनिया के लगभग आधे गैस आधारित बिजली उत्पादक देश शायद अपना “पीक गैस पावर” पार कर चुके हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक गैस से बिजली बनाने वाले 124 देशों में से 61 देश अपने सबसे ऊँचे गैस बिजली उत्पादन स्तर के बाद अब गिरावट की तरफ बढ़ चुके हैं। इनमें ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और जापान जैसे जी7 देश भी शामिल हैं।
जी7 देशों में 2025 के दौरान गैस आधारित बिजली उत्पादन 50 टेरावॉट घंटे घटा, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन 123 टेरावॉट घंटे बढ़ गया।
यानी दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाएँ अब धीरे-धीरे जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली से बाहर निकल रही हैं।
रिपोर्ट भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे बड़े देशों का भी ज़िक्र करती है।
2025 में दुनिया की कुल बिजली मांग का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा इन तीन देशों से आया, लेकिन इसके बावजूद इन देशों ने बिजली उत्पादन में गैस पर सीमित निर्भरता रखी।
भारत में बिजली मिश्रण में गैस की हिस्सेदारी 2010 के 12.6 प्रतिशत से घटकर 2025 में सिर्फ 2.3 प्रतिशत रह गई।
ब्राज़ील में गैस की हिस्सेदारी 2014 में 13.7 प्रतिशत पर थी, जो अब घटकर 7.3 प्रतिशत रह गई है। वहीं चीन में भारी बिजली मांग बढ़ने के बावजूद गैस की हिस्सेदारी लगभग 3 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है।
रिपोर्ट कहती है कि दुनिया अब धीरे-धीरे आयातित जीवाश्म ईंधनों से हटकर घरेलू स्तर पर पैदा होने वाली साफ़ बिजली की तरफ बढ़ रही है। इसके पीछे वजह सिर्फ जलवायु संकट नहीं है।
ऊर्जा सुरक्षा, बिजली की कीमतें और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा भी अब इस बदलाव को तेज़ कर रही हैं।
कई सालों तक दुनिया यह बहस करती रही कि कोयले से गैस की तरफ कितनी तेज़ी से बढ़ा जाए।
लेकिन अब बहस शायद उससे आगे निकल चुकी है।
अब सवाल यह है कि दुनिया गैस से आगे कितनी जल्दी बढ़ेगी।
और फिलहाल उस दौड़ में सबसे तेज़ भागती चीज़ सूरज की रोशनी दिखाई दे रही है।
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