पोषण से भरपूर व स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं उत्तराखंड के पारंपरिक खाद्य पदार्थ: डॉ सोनी

देहरादून। उत्तराखंड के पारंपरिक खाद्य पदार्थ न केवल पोषक तत्त्वों से भरपूर हैं, बल्कि स्थानीय भौगोलिक एवं जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल भी हैं। मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, स्थानीय दालें, अनाज एवं मौसमी खाद्य पदार्थ संतुलित आहार का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। बदलती जीवनशैली में इन पारंपरिक खाद्य पदार्थों को दैनिक आहार का हिस्सा बनाना और जंक फूड तथा अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर निर्भरता कम करना आवश्यक है।

यह बात धर्मानंद उनियाल राजकीय महाविद्यालय, नरेंद्रनगर की गृह विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. सोनी तिलारा ने राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मालदेवता, रायपुर में आयोजित विशेष व्याख्यान में कही। राष्ट्रीय पोषण सप्ताह के अंतर्गत महाविद्यालय के गृह विज्ञान विभाग द्वारा “उत्तराखंड के पारंपरिक खाद्य पदार्थ: पोषण, स्वास्थ्य एवं बदलती जीवनशैली में उनकी प्रासंगिकता” विषय पर विशेष व्याख्यान तथा “स्वस्थ आहार एवं संतुलित पोषण” विषय पर पोस्टर प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।

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कार्यक्रम का शुभारंभ गृह विज्ञान की विभागाध्यक्ष डॉ. डिम्पल भट्ट के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने कहा कि स्थानीय एवं पारंपरिक खाद्य पदार्थ हमारी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा होने के साथ-साथ पोषण की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी पारंपरिक खाद्य विरासत को समझने, उसे दैनिक आहार में शामिल करने तथा समाज में स्वस्थ एवं संतुलित भोजन के प्रति जागरूकता बढ़ाने का आह्वान किया।

महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. वी. पी. अग्रवाल ने कहा कि उत्तराखंड में उपलब्ध स्थानीय खाद्य संसाधनों और पारंपरिक खान-पान की पोषण संबंधी उपयोगिता को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने विद्यार्थियों को स्वस्थ खान-पान की आदतें अपनाने तथा पोषण संबंधी ज्ञान को समाज तक पहुंचाने के लिए प्रेरित किया।

इस अवसर पर आयोजित पोस्टर प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने अपनी रचनात्मक प्रस्तुतियों के माध्यम से स्वस्थ आहार, संतुलित पोषण और बेहतर जीवनशैली का प्रभावशाली संदेश दिया। पोस्टरों के माध्यम से विद्यार्थियों ने संतुलित आहार के महत्व के साथ स्थानीय खाद्य पदार्थों को दैनिक जीवन में शामिल करने के प्रति जागरूक किया।

विभागीय प्राध्यापिका पूजा रानी ने कहा कि स्थानीय एवं पारंपरिक खाद्य पदार्थों को अपनाना केवल बेहतर पोषण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह अपनी खाद्य विरासत के संरक्षण और स्थानीय संसाधनों के सतत उपयोग की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने युवाओं से पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक पोषण संबंधी समझ से जोड़कर समाज में स्वस्थ खान-पान को बढ़ावा देने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के अंत में प्राध्यापिका पूजा रानी ने मुख्य वक्ता, प्राचार्य, विभागाध्यक्ष, समस्त प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।

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