गढ़वाल विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा पर मंथन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 संग संगोष्ठी का शुभारंभ
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के बिड़ला परिसर में “राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के विशेष संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता” विषय पर गुरुवार से दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) के वित्तपोषण से आयोजित इस संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन उपयोगिता और नई शिक्षा नीति के साथ उसके समन्वय पर सार्थक चर्चा का मंच तैयार किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात विश्वविद्यालय कुलगीत की प्रस्तुति ने पूरे सभागार में गरिमा और एकता का वातावरण स्थापित किया। मंचासीन अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र एवं तुलसी पौधा भेंट कर भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का निर्वहन किया गया। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. अनु राही द्वारा किया गया। स्वागत भाषण में शिक्षा संकायाध्यक्ष प्रो. सुनीता गोदियाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा को एक जीवंत परंपरा बताते हुए वर्तमान शिक्षा प्रणाली में इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अमरजीत सिंह ने विषय की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए शोधार्थियों को प्रेरित किया कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा पर विश्वास रखते हुए निरंतर शोध कार्य करें।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरुत्थान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कहा कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी की रूपरेखा भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। उन्होंने बताया कि संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों का विश्लेषण करना, शैक्षिक विमर्श को समृद्ध करना तथा शोधार्थियों एवं शिक्षाविदों के लिए एक सशक्त अकादमिक मंच प्रदान करना है।
उन्होंने आगे कहा कि यह आयोजन बहुआयामी संवाद, अंतरविषयी दृष्टिकोण एवं नवाचारपरक विचारों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करेगा, जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित करने की दिशा में ठोस पहल संभव हो सकेगी। साथ ही, यह संगोष्ठी युवा शोधार्थियों में अनुसंधान के प्रति रुचि विकसित करने तथा उन्हें समसामयिक शैक्षिक चुनौतियों के समाधान हेतु प्रेरित करने का भी कार्य करेगी।
मुख्य अतिथि के रूप में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पूरी तरह भारतीय मूल्यों पर आधारित है, जो बौद्धिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास को समान महत्व देती है। उन्होंने ‘मेधा’, ‘विवेक’ एवं ‘नैतिकता’ को भारतीय शिक्षा का आधार बताते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है और उसे अपनी संस्कृति से जोड़ना है। उन्होंने यह भी कहा कि यह नीति वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
विशिष्ट अतिथि प्रो. राज शरण शाही ने अपने उद्घाटन व्याख्यान में भारतीय ज्ञान परंपरा की दार्शनिक गहराई एवं व्यावहारिक उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय चिंतन में ज्ञान और विज्ञान का अद्भुत समन्वय निहित है, जो व्यक्ति के समग्र विकास में सहायक है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्री प्रकाश सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में विश्वविद्यालय की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने प्रेरणादायक शब्दों में कहाकृ “जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए” और भारतीय ज्ञान को समाज में प्रकाश फैलाने वाली शक्ति बताया।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. अनिल कुमार नौटियाल द्वारा औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित किया गया। उन्होंने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के अदिति महाविद्यालय की प्रो. डॉ. पुनीता गुप्ता द्वारा “उत्तराखंड की रामलीलाः एक दृश्य यात्रा” विषय पर विशेष प्रदर्शनी भी प्रस्तुत की गई। इस प्रदर्शनी में रामलीला की विविध शैलियों, वेशभूषा, रंग-रूप, मंचन परंपराओं तथा महिलाओं की बढ़ती सहभागिता को प्रभावी ढंग से प्रदर्शित किया गया, जिसने उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सजीव रूप में प्रस्तुत किया।
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प्रो. एम. एस. पंवार ने संगोष्ठी को भारत के भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक एवं अनिवार्य बताते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का समन्वय ही देश को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। संगोष्ठी के सह-संयोजक डॉ. पुनीत वालिया कहा कि इस संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में पुनः स्थापित करना तथा शोधार्थियों और शिक्षाविदों के बीच सार्थक संवाद को बढ़ावा देना है। डॉ. शंकर सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा की वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता का शैक्षिक एवं वैचारिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए, उसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सिद्धांतों के साथ एकीकृत करने की दिशा में एक सार्थक पहल है।
उद्घाटन सत्र में देशभर से आए विद्वानों, शोधार्थियों, प्राध्यापकों एवं छात्रों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। यह सत्र अत्यंत प्रेरणादायक एवं ज्ञानवर्धक रहा, जिसने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। अंत में वंदे मातरम् के सामूहिक गायन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस अवसर पर डॉ. मुकुल पंत, प्रो. रमा मैखुरी, प्रो. गीता खंडूरी, कुलसचिव प्रो. वाई. पी. रावणी, वित्त अधिकारी डॉ. मोहित, प्रो. दीपक कुमार सहित लगभग 150 से अधिक प्रतिभागियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
प्रो. राकेश मैखुरी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना आज की अनिवार्य आवश्यकता है, क्योंकि यह हमारी समृद्ध भारतीय जीवन-पद्धति, मूल्यपरक सोच एवं सांस्कृतिक आधार से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि जब शिक्षा प्रणाली भारतीय जीवन-दृष्टि के अनुरूप विकसित होगी, तभी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों को प्रभावी रूप से साकार किया जा सकेगा तथा विद्यार्थियों का समग्र एवं संतुलित विकास सुनिश्चित होगा।
इस सत्र के अध्यक्ष प्रो. डी. एस. नेगी ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमारी शैक्षिक विरासत की मूल आधारशिला है, जिसे समकालीन शिक्षा के साथ समन्वित करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बल देते हुए कहा कि इस प्रकार के अकादमिक आयोजन न केवल वैचारिक विमर्श को समृद्ध करते हैं, बल्कि शिक्षा को मूल्यपरक एवं जीवनोपयोगी बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रो. आर. एस. फर्तियाल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित वैज्ञानिकता, तार्किकता एवं अनुभवजन्य दृष्टिकोण आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि इसे आधुनिक शोध एवं नवाचार के साथ जोड़कर शिक्षा के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए जा सकते हैं, जिससे विद्यार्थियों में समग्र सोच एवं रचनात्मकता का विकास होगा।
