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भारत के रिन्यूएबल एनर्जी मॉडल से अफ्रीका तक निवेश की नई राह
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2040 तक 356 अरब डॉलर का अवसर
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ज़ीरो कार्बन एनालिटिक्स की नई रिपोर्ट
आलेख : स्पष्ट नीतियाँ, जमीन और ट्रांसमिशन की बेहतर व्यवस्था, बिजली खरीद की गारंटी और भुगतान में सुधार। भारत ने इन कदमों से सोलर और विंड परियोजनाओं में निवेश का भरोसा बढ़ाया है। ज़ीरो कार्बन एनालिटिक्स की नई रिपोर्ट के मुताबिक, उभरते और विकासशील देशों में 2040 तक इन परियोजनाओं पर 356 अरब डॉलर का पूंजीगत खर्च हो सकता है।
भारत में सोलर और विंड एनर्जी का विस्तार केवल नई परियोजनाएँ लगाने से नहीं हुआ। इसके पीछे ऐसी नीतियों और नियमों की भूमिका भी रही है, जिन्होंने निवेशकों के सामने मौजूद कई जोखिम कम किए। जमीन की उपलब्धता, बिजली को ग्रिड तक पहुँचाना, बिजली खरीदने वाली कंपनियों से समय पर भुगतान और परियोजनाओं के लिए लंबी अवधि की स्पष्टता। इन मुद्दों पर सरकारी कदमों ने रिन्यूएबल एनर्जी क्षेत्र में निवेश का रास्ता आसान किया है।
शोध समूह ज़ीरो कार्बन एनालिटिक्स की अक्टूबर 2026 में जारी रिपोर्ट भारत के इसी अनुभव को उभरते और विकासशील देशों के लिए एक उदाहरण के रूप में देखती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने नीतिगत और नियामकीय उपायों के जरिए रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं से जुड़े विकास, निर्माण और बाजार के जोखिमों को कम करने की कोशिश की है। आज भारत रिन्यूएबल एनर्जी की स्थापित क्षमता के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है।
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-फॉसिल फ्यूल क्षमता का लक्ष्य रखा था। रिपोर्ट के अनुसार, देश 2025 में कुल ग्रिड क्षमता के 500 गीगावाट के स्तर तक पहुँच गया और अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) में तय 50% गैर-फॉसिल क्षमता का लक्ष्य पाँच साल पहले ही हासिल कर चुका है। अब 2035 तक करीब 60% गैर-फॉसिल क्षमता की योजना पर काम हो रहा है। सरकार ने वित्त वर्ष 2028 तक हर साल 50 गीगावाट रिन्यूएबल क्षमता की नीलामी का कार्यक्रम भी तय किया है।
निवेशकों के लिए जमीन और बिजली ट्रांसमिशन की उपलब्धता आसान बनाने के लिए अल्ट्रा मेगा रिन्यूएबल एनर्जी पार्क की योजना लाई गई। इन पार्कों में परियोजनाओं के लिए जमीन और ट्रांसमिशन तक पहुँच उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। बिजली क्षेत्र में 100% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति भी है।
इसके अलावा, परियोजनाओं को शुरुआती पूंजी और ब्याज सब्सिडी, ट्रांसमिशन और साझा बुनियादी ढाँचे के लिए सहायता तथा व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (वीजीएफ) जैसी सुविधाएँ दी गई हैं। रिन्यूएबल कंजम्पशन ऑब्लिगेशन के जरिए बिजली वितरण कंपनियों और बड़े औद्योगिक तथा व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए रिन्यूएबल स्रोतों से बिजली खरीदने की अनिवार्यता भी तय की गई है।
बिजली वितरण कंपनियों की ओर से उत्पादकों को भुगतान में देरी भी लंबे समय से निवेश की एक बड़ी चिंता रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार द्वारा 2022 में भुगतान में देरी रोकने के नियम लागू किए जाने के बाद वितरण कंपनियों का बकाया जून 2022 के 1,39,947 करोड़ रुपये से घटकर फरवरी 2026 में 4,109 करोड़ रुपये रह गया।
इन नीतिगत कदमों के साथ भारत में सोलर और विंड क्षमता का विस्तार भी हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, 2020 के बाद से देश की सोलर और विंड क्षमता में औसतन 20% से अधिक सालाना वृद्धि हुई। सोलर क्षमता 2010 के 0.09 गीगावाट से बढ़कर 2025 में 190 गीगावाट से अधिक हो गई।
उभरते बाजारों में 356 अरब डॉलर के निवेश का अनुमान
भारत का अनुभव ऐसे समय में अहम है, जब दुनिया के कई उभरते और विकासशील देशों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है। उद्योगों का विस्तार, शहरों का विकास और लोगों की बढ़ती ऊर्जा जरूरतें बिजली उत्पादन में नए निवेश की मांग कर रही हैं। ऐसे में सोलर और विंड एनर्जी इन देशों के लिए बड़ा अवसर बनकर सामने आ रही हैं।
ज़ीरो कार्बन एनालिटिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा रुझान जारी रहे तो उभरते और विकासशील देशों में सोलर और ऑनशोर विंड परियोजनाओं पर 2040 तक 356 अरब अमेरिकी डॉलर का पूंजीगत खर्च हो सकता है। रिपोर्ट का यह आकलन रिस्टैड के आँकड़ों पर आधारित है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि 2030 तक उभरते और विकासशील देशों में बिजली उत्पादन का 42% हिस्सा रिन्यूएबल एनर्जी से आ सकता है। इसके लिए मौजूदा आधार स्थिति में 3,251 गीगावाट अतिरिक्त रिन्यूएबल क्षमता जुड़ने की जरूरत होगी। तेज़ विस्तार वाले परिदृश्य में यह बढ़ोतरी 4,000 गीगावाट से अधिक हो सकती है।
लेकिन इस विस्तार के लिए पूंजी जुटाना आसान नहीं है। उभरते बाजारों में निवेश को लेकर राजनीतिक अस्थिरता, मुद्रा में उतार-चढ़ाव, बिजली खरीदने वाली कंपनियों की भुगतान क्षमता और परियोजनाओं से जुड़े जोखिमों को लेकर चिंताएँ रहती हैं। नतीजा यह होता है कि यहाँ सोलर और विंड परियोजनाओं के लिए पूंजी की लागत विकसित अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है।
क्या उभरते बाजारों में निवेश का जोखिम जरूरत से ज्यादा आँका जा रहा है?
रिपोर्ट का तर्क है कि इन बाजारों में निवेश का जोखिम कई बार वास्तविकता से अधिक आँका जाता है। बहुपक्षीय विकास बैंकों और विकास वित्त संस्थानों के निजी क्षेत्र को दिए गए ऋणों के आँकड़े इस अंतर की ओर इशारा करते हैं।
ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट्स रिस्क डेटाबेस (जीईएम्स) के 2006 से 2025 तक के आँकड़ों के अनुसार, उभरते बाजारों में निजी कंपनियों को दिए गए ऋण पर औसत कुल स्प्रेड 3.77% था। स्प्रेड वह अतिरिक्त मार्जिन है, जो ऋणदाता जोखिम की भरपाई के लिए ब्याज में जोड़ते हैं। इसी अवधि में वास्तविक क्रेडिट नुकसान की औसत दर केवल 0.9% रही। यानी ऋणदाताओं द्वारा वसूले गए मार्जिन और वास्तविक नुकसान के बीच 2.87 प्रतिशत अंक का अंतर था।
रिपोर्ट में रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं के लिए दिए गए ऋणों का अलग से भी आकलन किया गया है। 1994 से 2025 के बीच 159 देशों में 804 से अधिक निजी संस्थाओं को दिए गए ऋणों में डिफॉल्ट की औसत दर 2.61% रही। रिपोर्ट के मुताबिक, यह विकसित अर्थव्यवस्थाओं की निजी कंपनियों के डिफॉल्ट स्तर के करीब है। ऐसे ऋणों में डिफॉल्ट होने के बाद भी ऋणदाताओं ने औसतन 71.8% पूंजी वापस हासिल की।
क्रॉसबाउंड्री एनर्जी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैट टिलियर्ड का कहना है कि विकास बैंक उभरते बाजारों में निजी कंपनियों को कर्ज देते समय जोखिम को अक्सर अधिक आँकते हैं और संभावित लाभ को कम। उनके मुताबिक, विकास बैंकों और वित्त संस्थानों ने औसतन करीब 4% का मार्जिन लिया, जबकि डिफॉल्ट से उनका नुकसान 1% से भी कम रहा।
टिलियर्ड ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में इवानहो की कामोआ-काकुला तांबे की खदान में लगे चौबीसों घंटे काम करने वाले सोलर और बैटरी सिस्टम का उदाहरण दिया। उनके अनुसार, यह सुविधा हर महीने डीज़ल पर होने वाले करीब 1.1 करोड़ डॉलर के खर्च की बचत कर रही है। उनका कहना है कि ऐसी बचत करने वाले ग्राहक बिजली का भुगतान बंद नहीं करते। इसके बावजूद उभरते बाजारों में कई सोलर परियोजनाओं को विकसित देशों की तुलना में दोगुनी तक पूंजी लागत चुकानी पड़ती है। इससे ऐसी परियोजनाएँ भी आगे नहीं बढ़ पातीं, जिनके आर्थिक रूप से सफल होने के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं।
अफ्रीका के तीन देशों में बढ़ती बिजली मांग
रिपोर्ट में मिस्र, नाइजीरिया और सेनेगल को रिन्यूएबल एनर्जी निवेश के उभरते बाजारों के रूप में देखा गया है। इन देशों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ने का अनुमान है। सरकारें भी नीतिगत बदलाव, निवेश प्रोत्साहन और निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए सोलर और विंड परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही हैं।
मिस्र में बिजली की मांग 2025 के 182 टेरावाट-घंटे से बढ़कर 2030 में 220.7 टेरावाट-घंटे होने का अनुमान है। यह 21% की वृद्धि है। इसके बाद 2050 तक सालाना 4 से 5% की बढ़ोतरी का अनुमान है। मिस्र ने 2028 तक बिजली उत्पादन में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी 45% करने का लक्ष्य रखा है। सितंबर 2026 में उसने 2040 तक यह हिस्सेदारी 61.2% करने की दीर्घकालिक योजना भी घोषित की।
नाइजीरिया में बिजली की मांग 2025 के 33.7 टेरावाट-घंटे से बढ़कर 2030 में 45.9 टेरावाट-घंटे होने की उम्मीद है। यह 36% की वृद्धि होगी। इसके बाद अगले दो दशकों तक सालाना 8 से 9% की वृद्धि का अनुमान है। देश ने 2030 तक बिजली उत्पादन में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी 50% करने का लक्ष्य रखा है। 2023 के बिजली कानून के तहत बड़े उपभोक्ताओं को अपनी बिजली का एक हिस्सा रिन्यूएबल स्रोतों से खरीदने की व्यवस्था और मिनी-ग्रिड के विस्तार के लिए नियामकीय ढाँचा तैयार किया गया है।
सेनेगल में बिजली की मांग 2025 के 7.6 टेरावाट-घंटे से बढ़कर 2030 में 10 टेरावाट-घंटे होने का अनुमान है। यह 32% की वृद्धि है। 2050 तक सालाना 6 से 7% की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है। देश ने 2030 तक रिन्यूएबल क्षमता की हिस्सेदारी 40% करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए बिजली क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने और निवेश के लिए वित्तीय सहायता जुटाने की योजनाएँ बनाई गई हैं।
क्लाइमेट एक्शन प्लेटफॉर्म अफ्रीका की सह-संस्थापक कार्लिजन नाउवेन के मुताबिक, अफ्रीका की बिजली समस्या केवल बिजली उत्पादन बढ़ाने से हल नहीं होगी। इसके लिए ऐसी मांग भी तैयार करनी होगी, जो बिजली खरीद सके और उसका आर्थिक इस्तेमाल कर सके। घरों तक बिजली पहुँचाने के साथ उद्योगों, ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिल जैसे क्षेत्रों में बिजली की खपत बढ़ाने से परियोजनाओं का आर्थिक आधार मजबूत हो सकता है। इससे बिजली उत्पादन में निवेश को स्थिर मांग मिलेगी और अधिक लोगों तक स्वच्छ बिजली पहुँचाने का रास्ता खुलेगा।
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निवेश का जोखिम कम करने में सरकारों और विकास बैंकों की भूमिका
रिपोर्ट के मुताबिक, निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के लिए केवल बाजार की मांग काफी नहीं है। सरकारों को ऐसी नीतियाँ और नियम बनाने होंगे, जिनसे परियोजनाओं को जमीन, ग्रिड कनेक्शन और बिजली खरीद की स्पष्ट व्यवस्था मिले। ग्रीन गारंटी, स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण, पारदर्शी नीलामी और बेहतर डेटा उपलब्ध कराने से भी निवेश की अनिश्चितता घट सकती है।
बहुपक्षीय विकास बैंक और विकास वित्त संस्थान ब्लेंडेड फाइनेंस के जरिए निजी निवेश को बढ़ावा दे सकते हैं। इसमें सार्वजनिक और रियायती पूंजी के साथ निजी निवेश को जोड़ा जाता है। इससे परियोजना का कुछ जोखिम सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों के हिस्से में जाता है और निजी निवेशकों के लिए पूंजी जुटाना आसान हो सकता है।
मिस्र में निजी क्षेत्र ने अब तक 2.9 गीगावाट सोलर और 1.6 गीगावाट से अधिक ऑनशोर विंड क्षमता विकसित की है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश की सोलर और विंड क्षमता का 70% से अधिक निजी क्षेत्र ने बनाया है। नाइजीरिया 2025 में अफ्रीका का दूसरा सबसे बड़ा सोलर बाजार बना और वहाँ 800 मेगावाट से अधिक नई क्षमता जुड़ी। सेनेगल में 2010 के दशक के मध्य से अब तक सोलर और विंड परियोजनाओं के लिए 50 करोड़ डॉलर से अधिक का निवेश आया है।
नाइजीरिया में विश्व बैंक का 750 मिलियन डॉलर का डिस्ट्रीब्यूटेड एक्सेस थ्रू रिन्यूएबल एनर्जी स्केल-अप कार्यक्रम भी इसी दिशा में काम कर रहा है। इसका उद्देश्य निजी निवेश को प्रोत्साहित करके रिन्यूएबल एनर्जी के जरिए बिजली की पहुँच बढ़ाना है। इसमें प्रदर्शन आधारित अनुदान, क्रेडिट गारंटी, स्थानीय मुद्रा में गारंटी और बिजली खरीद समझौतों को मानकीकृत करने जैसे उपाय शामिल हैं।
भू-राजनीतिक तनाव के बीच रिन्यूएबल एनर्जी की अहमियत
तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा आपूर्ति मार्गों से जुड़ी अनिश्चितता ने भी कई देशों को ऊर्जा सुरक्षा पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया है। दिए गए विश्लेषण के मुताबिक, होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने के बाद कुछ उभरते बाजारों की सरकारों ने रिन्यूएबल एनर्जी पर निर्भरता बढ़ाने के लिए नीतिगत कदमों की घोषणा की है। इससे सरकारी समर्थन वाली सोलर और विंड परियोजनाओं में निवेश के अवसर बढ़ सकते हैं।
ज़ीरो कार्बन एनालिटिक्स की रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि उभरते बाजारों में रिन्यूएबल एनर्जी के विस्तार के लिए पूंजी और मांग, दोनों मौजूद हैं। भारत का अनुभव दिखाता है कि स्पष्ट लक्ष्य, स्थिर नीतियाँ और भुगतान व्यवस्था निवेशकों का भरोसा बढ़ा सकती हैं। मिस्र, नाइजीरिया और सेनेगल जैसे देशों में बढ़ती बिजली मांग के साथ ऐसे ही प्रयास नए निवेश के रास्ते खोल रहे हैं।
हालाँकि, निवेश के अवसर अपने आप वास्तविक परियोजनाओं में नहीं बदलेंगे। इसके लिए बिजली खरीदने वाले भरोसेमंद उपभोक्ता, भुगतान की पक्की व्यवस्था, मजबूत ग्रिड और ऐसी नीतियाँ जरूरी होंगी जो लंबे समय तक बनी रहें। यही तय करेगा कि उभरते बाजारों में रिन्यूएबल एनर्जी की बढ़ती मांग को कितनी तेजी से स्वच्छ बिजली में बदला जा सके।
