भीषण गर्मी से जूझ रहा रेगिस्तान का जहाज़, अफ्रीका में ऊंटों पर बढ़ा जलवायु संकट का असर
जिस जानवर (ऊंटों) को सदियों से रेगिस्तान में जीने का प्रतीक माना जाता रहा, अब वही बढ़ती गर्मी के आगे संघर्ष करता दिखाई दे रहा है
पशुपालकों का कहना है कि ऊंटों के पैरों में तपती रेत से छाले पड़ रहे हैं। उनकी आंखों से लगातार पानी निकल रहा है। त्वचा झुलस रही है और कई जानवरों के बाल झड़ने लगे हैं। कई ऊंट पहले की तरह लंबी दूरी तय नहीं कर पा रहे।
समस्या सिर्फ़ इथियोपिया तक सीमित नहीं है। जून में प्रकाशित एक शोध के अनुसार सोमालिया में करीब 46 प्रतिशत ऊंट पालने वाले परिवारों ने सूखे से जुड़ी ऊंटों की मौत का सामना किया। वहीं सूल (Sool) क्षेत्र में यह आंकड़ा करीब 73 प्रतिशत परिवारों तक पहुंच गया।
उधर केन्या के मार्साबिट काउंटी में पशु चिकित्सा अधिकारियों ने पिछले दो वर्षों में ऊंटों की मौत में 15 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की है। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या सिर्फ़ बढ़ते तापमान की नहीं है। जब भीषण गर्मी, लंबे समय तक पड़ा सूखा, पानी की कमी, घटती वनस्पति और छाया का अभाव एक साथ सामने आते हैं, तो ऊंटों पर गर्मी का दबाव कई गुना बढ़ जाता है।
रिपोर्टों में कहा गया है कि ऐसी परिस्थितियों में ऊंटों में निर्जलीकरण, थकान, संक्रमण, दूध उत्पादन में कमी, प्रजनन संबंधी समस्याएं, गुर्दों से जुड़ी दिक्कतें और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
इसका असर सिर्फ़ जानवरों तक सीमित नहीं रहता। Horn of Africa और North Africa के कई पशुपालक समुदायों के लिए ऊंट दूध, परिवहन और आय का प्रमुख स्रोत हैं। इसलिए जब ऊंट मरते हैं, तो परिवारों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा दोनों प्रभावित होती हैं।
हालात इतने मुश्किल हो चुके हैं कि कई पशुपालक अपने झुंड लेकर पानी और चरागाह की तलाश में दूसरे इलाकों की ओर जा रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक सोमालिया के कुछ हिस्सों में पानी की कीमत 2,000 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई है, जिससे यह संकट और गहरा गया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तर अफ्रीका दुनिया के सबसे तेज़ी से गर्म हो रहे क्षेत्रों में शामिल है। 1991 से 2025 के बीच यहां तापमान औसतन 0.43 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ा है।
यही वह क्षेत्र है जहां दुनिया के करीब 80 प्रतिशत एक-कूबड़ वाले ड्रोमेडरी ऊंट पाए जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ़ वन्यजीव संरक्षण का मुद्दा नहीं है। यह उन समुदायों की भी चुनौती है जिनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी ऊंटों पर निर्भर करती है।
यह कहानी एक बड़ा सवाल भी छोड़ जाती है। अगर रेगिस्तान में जीने के लिए सबसे उपयुक्त माने जाने वाले जीव भी बढ़ती गर्मी के असर से जूझ रहे हैं, तो बदलती जलवायु का प्रभाव आखिर कितना व्यापक होता जा रहा है?