ईडीआईआई ने ‘सूरत कट (डायमंड)’ को जीआई प्रमाणपत्र दिलाने में किया सहयोग; 5 शिल्पों को मिला जीआई टैग, कई अन्य प्रक्रिया में
देहरादून: एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (ईडीआईआई), अहमदाबाद पारंपरिक शिल्पों के संरक्षण और कारीगरों की आजीविका को बढ़ावा देने के लिए भौगोलिक संकेत (जीआई) सुविधा और बौद्धिक संपदा जागरूकता पहलों के माध्यम से अपने प्रयासों को निरंतर मजबूत कर रहा है। इन्हीं प्रयासों के अंतर्गत, ईडीआईआई ने 13–14 मार्च, 2026 के दौरान सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा समर्थित एमएसएमई इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी फैसिलिटेशन सेंटर (एमएसएमई आईपीएफसी) योजना के अंतर्गत ‘आईपी यात्रा’ शीर्षक से दो-दिवसीय बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) आउटरीच कार्यक्रम का आयोजन किया। आईपी प्रमोशन आउटरीच फाउंडेशन (आईपीपीओ) के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर से 500 से अधिक हितधारकों ने भाग लिया। इनमें एमएसएमई, स्टार्टअप, नवप्रवर्तक, कारीगर, शिक्षाविद तथा उद्योग प्रतिनिधि शामिल थे।
इस कार्यक्रम का उद्घाटन श्रीमती जी. लता, आईएएस, आयुक्त, एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट एंड इनोवेशन इंस्टीट्यूट – तमिलनाडु (ईडीआईआई-टीएन) ने किया। उनके साथ वाई. जे. त्रिवेदी एंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर जतिन त्रिवेदी तथा एमएसएमई डेवलपमेंट एंड फैसिलिटेशन ऑफिस (डीएफओ), अहमदाबाद के सहायक निदेशक राजेश कुमार भी उपस्थित थे। अपने मुख्य भाषण में श्रीमती जी. लता, आईएएस, आयुक्त, एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट एंड इनोवेशन इंस्टीट्यूट – तमिलनाडु (ईडीआईआई-टीएन) ने ‘नीम’ का उदाहरण देते हुए और एक वैश्विक पेटेंट विवाद का उल्लेख करते हुए कहा, “1995 में अमेरिका स्थित एक कंपनी ने नीम पर पेटेंट प्राप्त कर लिया था, जबकि भारत में एंटीसेप्टिक के रूप में नीम का उपयोग हजारों वर्षों से होता आ रहा है। फिर भी, अपने पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के प्रति पर्याप्त जागरूकता न होने के कारण किसी और ने इसका लाभ उठा लिया।
पेटेंट के महत्व को समझते हुए भारत ने इस मामले का केस लगभग दस वर्षों तक लड़ा, जिसके बाद वह पेटेंट निरस्त कर दिया गया। इसलिए, हमारे ज्ञान और विरासत की सुरक्षा के लिए पेटेंट कराना अत्यंत आवश्यक है।” कार्यक्रम की एक प्रमुख विशेषता भौगोलिक संकेत (जीआई) क्षेत्रीय बैठक रही। इस अवसर पर डॉ. उन्नत पंडित, कंट्रोलर जनरल ऑफ पेटेंट्स, डिज़ाइन्स एंड ट्रेड मार्क्स (सीजीपीडीटीएम), डीपीआईआईटी, भारत सरकार ने ‘सूरत कट (डायमंड)’ के लिए जीआई प्रमाणपत्र सूरत डायमंड एसोसिएशन के अध्यक्ष जगदीशभाई खुंट को अन्य एसोसिएशन सदस्यों के साथ प्रदान किया। सूरत का डायमंड उद्योग वैश्विक हीरा बाज़ार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और भारत के लगभग 90% पॉलिश्ड डायमंड के उत्पादन के लिए जाना जाता है। यह उपलब्धि जीआई ढांचे के अंतर्गत क्षेत्र की शिल्पकला और विरासत की मान्यता की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
डॉ. पंडित ने पारंपरिक शिल्पों से जुड़े कारीगरों को जीआई अधिकृत उपयोगकर्ता प्रमाणपत्र भी प्रदान किए। इस अवसर पर टंगालिया शॉल के 57 अधिकृत उपयोगकर्ताओं, जिनका प्रतिनिधित्व लवजीभाई परमार ने किया, तथा माता नी पछेड़ी के 34 अधिकृत उपयोगकर्ताओं, जिनका प्रतिनिधित्व भनुभाई चितारा ने किया, को इन विशिष्ट पारंपरिक शिल्पों के संरक्षण और संवर्धन में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। अपने संबोधन में डॉ. पंडित ने कहा, “भारत अनेक क्षेत्रों में वर्षों की साधना और अभ्यास पर आधारित ज्ञान की समृद्ध धरोहर का घर है। इसमें निहित विचारों और प्रक्रियाओं को सही समय पर प्रोत्साहित करना और संरक्षित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जीआई सुविधा हमारे उत्पादकों और कारीगरों के सामाजिक तथा आर्थिक कल्याण को बढ़ावा देने में अत्यंत सहायक है। मुझे प्रसन्नता है कि हम उनके उत्पादों को जीआई टैग दिलाने में सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं, जिससे उन्हें बेहतर पहचान मिल सके।”
ईडीआईआई पारंपरिक शिल्पों और उत्पादों के लिए जीआई पंजीकरण को सक्रिय रूप से समर्थन देता रहा है। अब तक संस्थान ने पाँच शिल्पों— गुजरात सूफ एम्ब्रॉयडरी, अहमदाबाद सोदागरी ब्लॉक प्रिंट, भरूच सुजनी वीविंग, सूरत सदेली क्राफ्ट और सूरत कट (डायमंड) —के लिए जीआई टैग दिलाने में सुविधा प्रदान की है। इसके अतिरिक्त, संस्थान ने एमएसएमई इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी फैसिलिटेशन सेंटर (एमएसएमई आईपीएफसी) के अंतर्गत गुजरात के 15 शिल्पों और कृषि उत्पादों के लिए जीआई टैगिंग की प्रक्रिया भी प्रारंभ की है, जो वर्तमान में उन्नत चरणों में है। कारीगरों और उत्पादक समूहों को और अधिक सशक्त समर्थन प्रदान करने के उद्देश्य से, ईडीआईआई ने अपने परिसर में नाबार्ड समर्थित क्षेत्रीय भौगोलिक संकेत (जीआई) फैसिलिटेशन सेंटर भी स्थापित किया है। यह केंद्र गुजरात में अपनी तरह का पहला केंद्र है, जिसे राज्यभर के कारीगरों, उत्पादक समूहों और उद्यमियों को सहयोग प्रदान करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है।
पिछले छह महीनों में इस केंद्र ने 3 लाख रुपये से अधिक की कुल बिक्री उत्पन्न की है, जिससे कारीगरों को बेहतर बाजार अवसर प्राप्त करने में सहायता मिली है। पेटेंट और जीआई टैगिंग के विषय पर टिप्पणी करते हुए एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (ईडीआईआई) के महानिदेशक डॉ. सुनील शुक्ला ने कहा, “पेटेंट दाखिल करना हमारे समृद्ध ज्ञान और परंपरा की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विचार से नवाचार और नवाचार से व्यावसायीकरण की दिशा में आगे बढ़ना आवश्यक है, ताकि विचार आर्थिक और सामाजिक कल्याण पर प्रभाव डाल सकें। भौगोलिक संकेत (जीआई) उत्पादों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण साधन हैं।”
आईपी यात्रा में विशेषज्ञों द्वारा संचालित सत्र भी आयोजित किए गए, जिनका उद्देश्य उद्यमियों और नवप्रवर्तकों के बीच बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रति जागरूकता और समझ को बढ़ाना था। ये निलेश पंडित, लीड (आईपीआर – पेटेंट्स), टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और नेहा वर्मा जनरल काउंसल, पुनिस्का ग्रुप द्वारा लिए गए, जिन्होंने पेटेंट रणनीति, आईपी संरक्षण, ब्रांड से एसेट (Brand to Asset) तथा व्यवसायिक विकास के लिए बौद्धिक संपदा के प्रभावी उपयोग के महत्व पर अपने विचार साझा किए।
