पीएम श्री राजकीय इंटर कॉलेज दुआधार में महका पहाड़ी स्वाद, छात्र-छात्राओं ने उठाया ‘गढ़ भोज’ का लुत्फ
टिहरी गढ़वाल। पीएम श्री राजकीय इंटर कॉलेज दुआधार में बुधवार को उत्तराखंड की पारंपरिक संस्कृति, स्थानीय खान-पान एवं मोटे अनाज के महत्व को विद्यार्थियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से गढ़ भोज का आयोजन किया गया। कार्यक्रम को विद्यालय के शिक्षक दुर्गेश सती द्वारा स्पॉन्सर किया गया।
गढ़ भोज में उत्तराखंड के पारंपरिक एवं पौष्टिक स्थानीय व्यंजनों को प्रमुखता से शामिल किया गया। विद्यार्थियों को झंगोरे की खीर, गहथ की दाल, चौंसा साग, छांछ की कड़ी, राई की भुज्जी तथा पीले कद्दू का रायता सहित विभिन्न पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद चखने का अवसर मिला।
कार्यक्रम में विद्यालय के प्राचार्य रमेशचंद्र जोशी ने गढ़ भोज के महत्व एवं उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्थानीय खान-पान, पारंपरिक अनाज तथा विशेष रूप से मोटे अनाज के स्वास्थ्यवर्धक गुणों की जानकारी विद्यार्थियों को दी।
उन्होंने कहा कि स्थानीय अनाज एवं पारंपरिक खाद्य पदार्थ पौष्टिक होने के साथ-साथ हमारी कृषि, संस्कृति और परंपराओं से भी जुड़े हुए हैं। वर्तमान समय में मोटे अनाजों के महत्व को समझना और उन्हें दैनिक आहार में शामिल करना अत्यंत उपयोगी है।
विद्यालय के सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं ने भी विद्यार्थियों को गढ़ भोज की परंपरा, स्थानीय खाद्य पदार्थों के पोषण संबंधी महत्व तथा उत्तराखंड की लोक संस्कृति के संरक्षण के बारे में जानकारी दी। शिक्षकों ने विद्यार्थियों को स्थानीय उत्पादों एवं पारंपरिक व्यंजनों को बढ़ावा देने तथा आने वाली पीढ़ियों तक अपनी समृद्ध खान-पान की परंपरा को पहुंचाने के लिए प्रेरित किया।
इस अवसर पर कक्षा 6 से कक्षा 12 तक के सभी छात्र-छात्राओं तथा विद्यालय के शिक्षक-कर्मचारियों ने गढ़ भोज का आनंद लिया। सभी ने पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद लिया और स्थानीय खान-पान की समृद्ध परंपरा के बारे में जानकारी प्राप्त की।
गढ़ भोज के प्रायोजक (स्पॉन्सर) शिक्षक दुर्गेश सती ने कहा कि उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजन केवल भोजन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे आयोजनों से विद्यार्थियों को अपनी जड़ों, स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक खान-पान से जोड़ने का अवसर मिलता है।
कार्यक्रम में विद्यालय परिवार की सक्रिय सहभागिता रही। विद्यालय परिवार ने गढ़ भोज को स्थानीय संस्कृति, पौष्टिक खान-पान और पारंपरिक अनाजों के संरक्षण की दिशा में एक सार्थक पहल बताया।
